बुधवार, 4 जनवरी 2012

makar sankranti

धर्म शास्त्रों में मान्यता है की सूर्य की गति तिल तिल करके बदती है | इसीलिए इस दिन तिल के लड्डू का दान करने का विशेष महत्त्व है | साथ ही इस दिन दान पुन्य , जप तप , देव आराधना , यज्ञ आदि करवाने चाहिए | तिल खाना इस पर्व की प्रधानता है | इस दिन तिल का दान , तिल का हवं , आदि सभी कार्य पापनाशक है | मकर संक्रांति का महत्त्व इस कारन भी बढ जाता है क्योकि इस समय  सूर्य उस कोण में आ जाता है जब वह अपनी सम्पूर्ण रश्मिया मानव पर उतारता है | सूर्य तो ब्रम्हा , विष्णु , महेश तीनो शक्तियों का स्वरूप है , इस कारण मकर संक्रांति पर सूर्य  साधना करने से इन तीनो की साधना का लाभ प्राप्त होता है | 
साधना विधान :- मकर संक्रांति पुण्यकाल के समय पवित्र नदी में स्नान करे या घर में जल में तिल और गंगाजल डालकर स्नान करे | सनन के पश्चात ताम्बे के लोटे में शुद्ध जल भरकर उसमे लाल पुष्प , लाल चन्दन , चावल , तिल आदि डालकर मंत्र का जप करते हुए सूर्य को अर्घ्य  दे | अर्घ्य देते समय आपकी द्रष्टि गिरते हुए जल में प्रतिबिंबित सूर्य की किरणों पर होनी चाहिए | 
                            मंत्र :- ॐ घ्रनी सूर्याय नम: |
अर्घ्य के पश्चात् आदित्य ह्रदय स्त्रोत का तीन बार पाठ करे | जिन व्यक्तियों की कुंडली में सूर्य की महादशा या अंतर दशा चल रही हो , उनके लिए संक्रांति के दिन भगवान सूर्य की पूजा करनी फायदेमंद है | 

makar sankranti

भारत में हर पर्व को बड़ी श्रद्धा आस्था एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है | मकर संक्रांति का पर्व सम्पूर्ण भारत में सूर्योपासना के रूप में मनाया जाता है | सूर्य प्रत्यक्ष द्रष्टिगोचर होने वाले एक मात्र देवता है | इसीलिए मकर संक्रांति के दिन सूर्य की पूजा कर उससे ऊर्जा प्राप्त करने का विशेष महत्त्व है | सूर्य जब मकर राशी में प्रवेश करते है तब राशी परिवर्तन का वह दिन ही मकर संक्रांति या उत्तरायण प्रारंभ कहलाता है | उत्तरायण शब्द उत्तर एवं अयन से मिलकर बना है | अयन का अर्थ होता है चलना | अर्थात सूर्य के उत्तर दिशा में चलने को उत्तरायण कहते है | उत्तरायण कल को प्राचीन ऋषि मुनियों ने पराविद्या , जप , तप , सिद्धि प्राप्त करने के लिए उचित समय माना है | चूकी मकर संक्रांति उत्तरायण काल का प्रारंभ माना जाता है इसीलिए इस दिन किया गया दान , पुन्य , फलदायी होता है | 
खगोलीय आधार :- गृह के एक राशी से दूसरी राशी में परिवर्तन को संक्रांति कहते है | सूर्य के धनु राशी से मकर राशी में प्रवेश के कारन इसे मकर संक्रांति कहते है तथा इसे अयन संक्रांति होने के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है | रविवार को आने वाली संक्रांति धोरा संक्रांति , सोम को स्वक्षी , मंगल को महोदरी , बुध को मन्दाकिनी , गुरु को मंदा , शुक्र को मिश्रिता , शनि को राक्षसी संक्रांति कहलाती है | 

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

diwali poojan vidhi

  दीपावली पूजन विधि :- दीपावली की रात को अपने घर को एवं स्वयं को सुद्ध स्वछ रखते हुए पुरे परिवार के साथ सर्धा भाव से माँ लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए इस दिन माँ लक्ष्मी एवेम श्री गणेश जी की नूतन प्रतिमाओ का ही पूजन करना चाहिए पूजन के लिए गणेश जी के दाहिने भाग में लक्ष्मी जी को विराजित करे लक्ष्मी जी को अस्तदल कमल बनाकर विराजित करे पूजा सामग्री जिसमे जल, घंटा, सरसों, अथवा तिल के तेल का दीपक हो, को बाये और रखे बाकि सामग्री सामने रखे आप पूर्व दिशा की और मुह करके बैठे, कलश की स्थापना करे कलश पर स्वस्तिक बनाये रोली मोली चढाये कलश में जल चन्दन दूब, कुश, सुपारी, पंचरतन,और द्रव्य डाले फिर पूर्ण  पात्र नारियल और वस्त्रादि अर्पित करे  साथ ही जो भी आपके पास यन्त्र आदि हो उनको भी सामने रखे  और पूजा करे,फिर श्री गणेश का ध्यान करते हुए उन्हें आसन दे फिर पाव धुलाये और दूध, घी, दही, सहद और शकर से स्नान कराये और साथ ही माँ लक्ष्मी जी का भी इसी प्रकार से स्नान कराये माँ लक्ष्मी जी को हल्दी से स्नान जरूर कराये तथा माता जी को वस्त्र ,उपवस्त्र श्रंगार का सामान आभुसन  दूप  दीप हल्दी चन्दन सिन्दूर, कुमकुम, इत्र अक्षत कमल पुष्प दुब मिस्ठन चदाये  पुरे समय ॐ महालक्ष्मी  नमः मंत्र का जाप करे दीपावली की पूरी रात ही किसी भी मंत्र की सिद्धि के लिए शुभ होती है हो सके तो श्री सूक्त का पाठ जरूर करे|